वीरपुत्र
थे वो चालीस, जो
पुलवामा में शहीद हुए..
अपनी
धरती माँ के लिए
वो, हस्ते हस्ते कुर्बान हुए..
१२ दिन लौट गए
पर, शहादत की आग कायम
हे...
उनके
वीरता के क़िस्सोंसे, सभीकी
आँखे नम हे...
आप के लौटने के
आशा में, पूरा गांव
राह देख रहा हे....
पापा
लौट कर आएंगे सोचकर,
बच्चा ख़ुशी से झूम
उठता हे...
केहकर
गए थे हम आएंगे,
आकर अपनी माँ से
मिलेंगे...
नहीं
पता था हमे के,
तिरंगे
में लिपटकर आएंगे... साथ में अपनी
फ़ौज लाएंगे...
पूरी
दूनिया मना रही थी,
वो दिन अपने प्यार
के लिए ..
पर आप तो शहीद
होकर हमे, वतन के
कर्जदार कर गए...
बीवी
का तुम हाल न
पूछो, फूटफूट कर वो हे
रोई...
इतनी
कठीन घड़ी में भी
वो, बच्चो के खातिर धैर्य
न खोई...
आपकी
वीरपत्नी कहे, में आत्मविश्वास
ना खोऊंगी...
केहती हे मेरे बच्चोको, सेना
में ही में भेजूंगी...
धन्य
हे वो मातापिता, जिनके
घर जाबाज़ पुत्र हे आए...
एक ही लक्ष्य था
जिनका, धरती माँ सुख
शांती पाए...
देश
की हिफाजत में, पा लिया
आपने वीरमरण...
इस बहादुरता के लिए, देशवासी
करे आपको नमन ...
जय हिन्द | जय भारत...
- विनय
दिलीप मांडगे
पिंपरी
- चिंचवड, पुणे, महाराष्ट्र
Jai hind
ReplyDelete